
“यादों के पन्ने”
वक़्त के साथ जैसे अमलतास,
से हो गए यादों के पन्ने।
मगर महक अब भी वही है,
गुलाब,बेला की डालें घने।
छू लो गर यादों का चंचल दामन,
लगे अहसास के मोती बिखरने।
कभी मुस्काये मीठी खुशियाँ,
तो कभी दर्द ओस बन लगे चमकने।
अमलतास जैसे इन पन्नों पर,
शब्द हैं सुर्ख गुलाब से बने।
पल-पल हृदय में यादों की,
एक बगिया-सी लगे महकने।
– सृष्टि स्नेही