वक़्त के साथ जैसे अमलतास, से हो गए यादों के पन्ने। मगर महक अब भी वही है, गुलाब,बेला की डालें घने। छू लो गर यादों का चंचल दामन, लगे अहसास के मोती बिखरने। कभी मुस्काये मीठी खुशियाँ, तो कभी दर्द ओस बन लगे चमकने। अमलतास जैसे इन पन्नों पर, शब्द हैं सुर्ख गुलाब से बने। पल-पल हृदय में यादों की, एक बगिया-सी लगे महकने।
– सृष्टि स्नेही
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ज़िन्दगी एक खुली किताब है, जिसमें पन्ने बेहिसाब हैं। कुछ में तो खूबसूरत ख़्वाब हैं, और कुछ में दर्द का हिसाब है। किसी पन्ने में एक खूबसूरत मुलाक़ात है, तो कहीं तन्हाई की एक एक रात है। कोई पन्ना लिए सपनों की सौगात है, तो कोई सिर्फ़ अश्कों की बारात है। ज़िन्दगी एक खुली किताब है, जिसके पन्ने उड़ते ख़्वाब हैं। खट्टे मीठे कुछ तीखे, हर तरह का यहाँ स्वाद है। पर कहीं एक जगह पर, ना इनका ठहराव है।
ज़िन्दगी एक खुली किताब है, जिसमें पन्ने बेहिसाब हैं। कुछ में तो खूबसूरत ख़्वाब हैं, और कुछ में दर्द का हिसाब है। किसी पन्ने में एक खूबसूरत मुलाक़ात है, तो कहीं तन्हाई की एक एक रात है। कोई पन्ना लिए सपनों की सौगात है, तो कोई सिर्फ़ अश्कों की बारात है। ज़िन्दगी एक खुली किताब है, जिसके पन्ने उड़ते ख़्वाब हैं। खट्टे मीठे कुछ तीखे, हर तरह का यहाँ स्वाद है। पर कहीं एक जगह पर, ना इनका ठहराव है।